Thursday, October 22, 2009

बालिका वधु

कलर्स चैनल में सबसे पहले प्रसारित होने वाला कार्यक्रम"बालिका वधु" हैं जिसने थोड़े से ही समय में अपनी अलग पहचान बनाली थी, इस कार्यक्रम ने कई बड़े चैनलों के सुपरहिट कार्यक्रमों की छुट्टी करदी थी|इसका"कांसेप्ट" इतना नया व अनोखा था की यह रातोरात जबरदस्त लोकप्रियता पा गया |पर जब कोई धारावाहिक सफलता प्राप्त करता हैं तो निर्देशक उस धारावाहिक की सफलता को भुनाना शुरू कर देते हैं|इस धारावाहिक के साथ भी ऐसा ही हुआ यह सुपरहिट धारावाहिक भी इसी राह पर चलने लगा हैं जिससे यह अपने मूल कथानक से भटक गया प्रतीत होता हैं| एक सीधे सरल प्लाट को निर्देशक ने बाल विवाह से होने वाली हानियो से लेकर पुश्तैनी दुश्मनी तक पहुँचा दिया हैं इस दौरान कहानी कई जगह भटकी,मुख्यपात्र आनंदी के विवाह से होकर,प्रताप की मृत्यु,सुगना का दुसरा विवाह व अवैध संतान,श्याम व महावीर सिंह का बेवजह प्रवेश ना सिर्फ़ मूलकथा को उलझा रहा हैं बल्कि दर्शको की दुरी भी बना रहा हैं|जिससे यह समझ पाना मुश्किल हैं की आख़िर निर्देशक दर्शाना व दिखाना क्या चाह रहा हैं|हम जो देख रहे हैं उसका बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई से तो कुछ लेना देना प्रतीत नही होता कम से कम मेरी नज़र में तो नही |
अगले अंक में "उतरन"धारावाहिक पर हमारा विश्लेषण पढ़ना न भूले .................इति

Wednesday, October 21, 2009

कलरलेस होता कलर्स 1

आप सभी कलर्स चैनल तो देखते ही होंगे.क्या कुछ समय से ऐसा नही लग रहा की इस चैनल की जो विशेषता थी वो ख़त्म होती जा रही हैं इसके सारे कार्यक्रम या तो नक़ल पर आधारित हैं या फ़िर रिअल्टी शोज पर,शुरआत बड़ी धमाकेदार थी आज से लगभग डेढ़ साल पहले जब इस चैनल की शुरुआत हुई थी
तो ऐसा लगा था की यह चैनल कुछ अलग होगा और ऐसा था भी बालिका वधु,खतरों के खिलाड़ी जैसे अन्य कार्यक्रमों की बदौलत इस चैनल ने सभी नामी चैनलों की जमात में अपनी अलग पहचान बना ली थी परन्तु बाद में यह अपनी पकड़ खोता चला गया और जा रहा हैं|
आइये देखते हैं इस चैनल पर प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रमों का विश्लेषण -

शाहनवाज हुसैन को वीजा

शाहनवाज हुसैन जी को वीजा न देकर अमरीका ने अपने दोगलेपन के होने का पक्का सबूत दे दिया |एक तो शाहनवाज जी को वीजा सिर्फ़ इस बात पर नही दिया की उनके नाम में हुसैन आता हैं लेकिन वही अपने बराक ओबामा को राष्ट्रपति इसलिए बना दिया की उनके नाम में हुसैन आता हैं |

Tuesday, October 20, 2009

कम आसमां कम ज़मी

कल शाम मेट्रो रेल में यात्रा करते समय जब बाहर की तरफ़ नज़र गई तो अचानक दिमाग में कुछ शब्द उमड़ने लगे जिन्हें लिखने का यह छोटा सा प्रयास कर रहां हूँ व आशाः करता हूँ की आप सभी को यह अवश्य पसंद आयेंगे |

कम "आसमां" कम "ज़मीं" है यारो
हम भी कितने"गरीब"है यारो

कल जो लुटा करते थे,घरो को
वो आज सबसे बड़े "शरीफ" है यारो

कोई"बंगले" में कोई"फुटपाथ"पर
अपना अपना "नसीब" है यारो

कल तक जो मेरे बेहद"अज़ीज़" थे
आज वो मेरे ही "रकीब" है यारो

पीना, पीलाना,पीकर धमकाना
ये कैसी,कौनसी"तमीज" है यारो

चंद "हसरते" व थोडी "ख्वाहिसे"
बस यही अपनी "खरीद" है यारो


आ ही गए हो तो"पीकर" चलो
"मैयखाना- ए- जिंद" करीब है यारो

Sunday, October 18, 2009

एक वंदना

आज एक "वंदना "जो की स्कूल के दिनों में अक्सर दूरदर्शन के किसी कार्यक्रम में आया करती थी उसे आप सभी के सम्मुख रख रहा हूँ इस आशा के साथ की आपको भी यह उतनी ही अच्छी लगेगी जितनी की मुझे लगी यह वंदना इतने समय तक मुझे याद इसलिए रही की इसके शब्द इतने सुंदर व सरल हैं की दिल को छू जाते हैं

अज्ञान- के अंधेरो से ......,हमें ज्ञान के उजाले की और ले चलो
असत्य की दीवारों से, हमें सत्य के शिवालो को और ले चलो
सारे जहाँ के सब दुखो का "एक ही तो निदान हैं"
या तो वह अज्ञान- हैं ....या तो वह अभिमान हैं
नफरतों के ज़हर से,प्रेम के प्यालो की और ले चलो
अज्ञान- के ....
हमके मर्यादा न तोडे "अपनी सीमा में रहे"
ना करे अन्याय और ना अन्याय औरो का सहे
कायरो से दूर हो,वीर ह्रदयवालो की और ले चलो
अज्ञान- के अंधेरो से हमें ज्ञान के उजालो की और ले चलो
असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो
अज्ञान- के ...........

Thursday, October 15, 2009

कुछ खेल संगंणक के

यह "संगंणक" भी बहुत मज़ेदार वस्तु हैंक्या कहाँ, नही जानते "संगंणक" क्या हैं? अजी जनाब "कैलकुलेटर" जी हां कैलकुलेटर ही संगंणक कहलाता हैं,बड़े काम की चीज़ हैं साहब बिना इसके आज की दुनिया में काम हिम नही चलता खैर आप परेशान न हो मैं आज आपको कोई इसकी जानकारी नही दे रहां मैं तो इसमे खेले जाने वाले कुछ खेलो के बारे में आपको बताना चाहता हूँ ।

कल्पना कीजिये की तीन लड़के व तीन लडकियां (अलग अलग) फ़िल्म देखने एक ही सिनेमा हॉल में गए(अगर एक साथ जाते तो भी क्या हो जाता )फ़िल्म शुरू ही हुई थी की बिजली चली गई बिजली को चालू करने के लिए ९९९० वाट बिजली की अलग से कटौती की गई जब बिजली आई तो एक अलग ही नज़ारा देखने को मिला क्या आप बता सकते हैं वो नज़ारा क्या था
नही समझे ना अजी जनाब अब इसी कहानी को संगंणक सॉरी कैलकुलेटर की मदद से कर के देखें माजरा समझ में आ जाएगा बस लड़को को १ का अंक तथा लड़कियों को ० का अंक दे दीजिये व बिजली की कटौती हेतु ९९९० को घटा दीजिये

खेल नंबर २)यदि आप को किसी को हैलो कहना हो तो .०३८६७ को २ से मल्टीप्लाई कीजिये तथा उत्तर को उल्टा करके पढिये

अगर आप को जूते चाहिए तो १०६०० को २ से भाग करके उसमे ४५ जोड़ दे तथा उल्टा करके देखे,आपको शूस शब्द नज़र आएगा

अब एक पहेली आप सभी के लिए कैलकुलेटर में १०० का अंक सिर्फ़ तीन बटनों का प्रयोग करके लाना हैं शर्त यह हैं की कोई भी बटन दो बार इस्तेमाल नही होना चाहिए चकरा गए ना अजी जनाब कोशिश तो कीजिये ..............

Tuesday, October 13, 2009

एक गीत आपके लिए

आपसे मिलना हमको अच्छा लगा
आपके साथ चलना अच्छा लगा.........

बाते होने लगी वक्त कटता रहा
मुस्कुराते हुए साथ चलता रहा
आपसे वक्त भी करने सजदा लगा
आपके साथ चलना अच्छा लगा
आपसे मिलना .................

सोचते ही रहे आज हम हरपल
आपके हुस्न पे लिखे हम एक ग़ज़ल
आपसे जाने क्यूँ ना हमको परदा लगा
आपके साथ चलना अच्छा लगा
आपसे मिलना ...............

आपसे मिलने घर तो आयेंगे हम
आपको अब तो पाना चाहेंगे हम
आपसा कोई ना हमको अपना लगा
आपके साथ चलना अच्छा लगा
आपसे मिलना .....................